बहुभाषा 2025 : भारत की भाषाई विविधता का उत्सव

हैदराबाद, आईआईआईटी हैदराबाद के द्वारा 6 से 8 नवंबर 2025 तक बहुभाषा 2025 का आयोजन किया गया। यह तीन दिवसीय कार्यक्रम नीति, प्रौद्योगिकी और समुदाय के दृष्टिकोण से भारत की भाषाई विविधता का उत्सव था। इस कार्यक्रम में देश में भाषा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य कर रहे शिक्षाविदों, प्रौद्योगिकीविदों, नीति निर्माताओं, मुक्त ज्ञान के प्रति उत्साही और सामुदायिक संगठनों को डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं के भविष्य पर विचार-विमर्श करने के लिए एक साथ उपस्थित थे। इस कार्यक्रम का एक प्रमुख फोकस कम संसाधन वाली और कम प्रतिनिधित्व वाली भाषाओं के लिए चुनौतियों और अवसरों पर विमर्श करना था, जिसमें भाषा प्रलेखन, डिजिटल संरक्षण और मुक्त ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र जैसे विषय शामिल थे। इस कार्यक्रम में यह तय किया गया कि डिजिटल भाषा संरक्षण, पुनरोद्धार और विकास पर उभरते मुद्दों और चल रहे कार्यों का मानचित्रण करने और सहयोग के लिए कार्रवाई योग्य क्षेत्रों की पहचान करने के लिए एक मंच के रूप में भी काम करेगा।
कार्यक्रम में चर्चा के जो प्रमुख विषय थे उसमें शामिल विषयों में नीति के विषय में भाषाई विविधता को आकार देने और बाधाओं को दूर करने में नीति और नियोजन की भूमिका पर चर्चा की गई। इसमें प्रौद्योगिकी, शिक्षा और शासन जैसे क्षेत्रों में हाल के नीतिगत विकास और भारतीय भाषाओं के दैनिक उपयोग पर उनका प्रभाव चर्चा की गई।
प्रौद्योगिकी के विषय पर इस बात का पता लगाया जाएगा कि डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ भारतीय भाषाओं तक सार्थक पहुँच और उपयोग को कैसे प्रभावित कर रही हैं, मौजूदा ढाँचागत कमियाँ क्या हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों का क्या प्रभाव है। यह विशेष रूप से भारतीय भाषा कंप्यूटिंग, स्थानीयकरण और उसमें योगदान देने वाली मुक्त ज्ञान परियोजनाओं में प्रगति पर केंद्रित रहा।
समुदाय के विषय पर भाषा को उसके दैनिक अनुभवों और रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से जीवंत संस्कृति और सामाजिक प्रयोग के रूप में भाषा प्रलेखन, संरक्षण और पुनरोद्धार पर समुदाय-नेतृत्व वाली परियोजनाओं पर एक प्रदर्शन और आलोचनात्मक चर्चा की गई। इसके अलावा, यह भारतीय भाषाओं पर समुदाय-नेतृत्व वाले कार्य को आगे बढ़ाने के तरीकों की भी खोज पर चर्चा हुई। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम म गोलमेज और पैनल चर्चा, कार्यशाला, प्रदर्शन और वार्तालाप जैसे विभिन्न स्वरूपों के सत्र सम्‍पन्‍न हुए।
यह कार्यक्रम ओपन नॉलेज इनिशिएटिव्स (ओकेआई), आरसीटीएस द्वारा भाषा प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र (एलटीआरसी), आईआईआईटी हैदराबाद के सहयोग से आयोजित किया गया था। बहुभाषा के पहले दिन इस कार्यक्रम में मौजूदा प्रयुक्‍त प्रौद्यौगिकी की जानकारी के साथ ही इस बात पर भी चर्चा की गई कि हम क्या गलत कर रहे हैं। आईआईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर देवा प्रियकुमार ने आग्रह किया कि भाषा अनुसंधान को कागज़ों से आगे बढ़कर ऐसे उपकरणों की ओर बढ़ना चाहिए जो वास्तविक दुनिया की संचार चुनौतियों का समाधान करे। उन्‍होने कहा कि भाषा अनुसंधान को कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर वास्तविक दुनिया की संचार चुनौतियों को हल करने वाले उपकरणों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
प्रोफेसर वसुदेवा वर्मा ने ‘कहानी कहने के एक मूक संकट’ के बारे में चेतावनी दी, और कहा कि यदि भारत अपनी भाषाई विरासत को खुला नहीं बनाता है तो अन्य लोग इसे हमारे स्‍वैच्छिक मौन के रूप में परिभाषित करेंगे। डिजिटल सोसायटी हेतु भाषा नीति और आधारभूत संरचना के संबंध में बोलते हुए आमंत्रित लेखक एवं पूर्व आईएएस वादरेवु चिनवीरभद्रु ने अपने मुख्य भाषण में शिक्षा को रटने से परे जाकर खुले, सहयोगी पारिस्थितिकी तंत्र को अपनाने का आग्रह किया।
शिक्षा एवं प्रशासनिक क्षेत्र में भाषा नीति पर पैनल कार्यशाला में मराठी अभ्यास केंद्र के डॉ. दीपक पवार, रॉल्फ शोएम्ब्स विद्याश्रम के डॉ. बोरो बास्की, कोयथोर बाटा के जी. यादैया, जे.एन.यू. की प्रोफेसर डॉ. पापिया सेनगुप्ता नें नीतिगत कमियों, सुरक्षित ऑनलाइन स्थानों के लिए नागरिक तकनीक और कम-संसाधन वाली भाषाओं के सामुदायिक स्वामित्व पर चर्चा की।
टैटल सिविक टेक्नोलॉजीज के डेनी जॉर्ज और कौस्तुभ के नें डिजिटल वर्ड में उली की गंभीरता को देखते हुए ऐसे डिजिटल वातावरण साझा रूप में तैयार करने पर विस्‍तृत योजनाओं पर चर्चा की जहाँ उपयोगकर्ता सुरक्षित और सम्मानपूर्वक संवाद कर सकें।
कम संसाधन वाली भाषाओं के लिए तकनीक और नीति दोनों स्तरों पर किए जाने वाले ठोस कदम या उपाय पर आयोजित परिचर्चा में उन भाषाओं पर जिनके पास डिजिटल या तकनीकी संसाधन (डेटा, टूल्स, सॉफ्टवेयर आदि) कम हैं उन्‍हे सहयोग करने पर वार्ताकारों नें बल दिया। पेनल में स्वतंत्र शोधकर्ता अनिवर अरविंद, वांचो साहित्यिक सोसायटी के बनवांग लोसु, कोल्हान विश्वविद्यालय की डॉ. मीनाक्षी मुंडा, विद्या प्रबोधिनी के डॉ. भूषण भावे, विकिमीडिया फाउंडेशन की रूना भट्टाचार्जी थे। दिन के समापन सत्र में आदिवासी हो समाज महासभा द्वारा हो-भाषा के व्‍याकरण किताब का विमोचन हुआ। परिचर्चा के क्रम में भाषा आंदोलन के भविष्य पर इसके सामाजिक-आंदोलनात्मक पहलुओं पर चर्चा हुई जो नवीन प्रवृत्तियों और नीतिगत विषयों पर केन्द्रित रही। भाषा सक्रियता के भविष्य पर प्रोफेसर पी. साईनाथ और प्रोफेसर दीप्ति मिश्रा शर्मा का उल्‍लेखनीय वार्ता के साथ सत्र का समापन हुआ।
दूसरे दिन उत्पाद एवं तकनीक : पहुँच और नवाचार को बढ़ावा देने वाली आधारभूत संरचनाएँ विषय पर आधारित कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भारतीय भाषाएँ: संभावनाएँ और समस्याएँ विषय पर आईआईटी दिल्ली प्रो. अर्जुन घोष नें अपने मुख्य भाषण में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि कैसे तकनीक लगातार भाषा, पहचान और पहुँच को नया आकार देती है। प्रदर्शनों में समुदाय-संचालित नवाचारों के प्रभाव को दिखाया गया, जिसमें असमिया टाइपिंग टूल, सिंधी और छत्तीसगढ़ी भाषा अभिलेखागार और एक तमिल वर्तनी-जांचकर्ता शामिल हैं। छत्‍तीसगढ़ से आमंत्रित संजीव तिवारी नें छत्तीसगढ़ी भाषा संबंधी अभिलेखागार और भषायी प्राद्यौगिकी के संबंध में अपना वक्‍तव्‍य दिया। इस दिन एलटीआरसी द्वारा भाषावर्स पर एक व्यावहारिक कार्यशाला और डिजिटल क्षेत्र में अनुवाद, पहुँच और पहचान की राजनीति पर एक पैनल चर्चा भी शामिल थी, जिसके बाद साइंस गैलरी बेंगलुरु द्वारा एक इंटरैक्टिव सत्र आयोजित किया गया।
तीसरे दिन की शुरुआत कम संसाधन और कम दृश्यता वाले संदर्भों के लिए संसाधनों के निर्माण पर एक पैनल चर्चा के साथ हुई, जिसमें दस्तावेज़ीकरण के पीछे के सामाजिक श्रम और भाषाई भविष्य को आकार देने में सामुदायिक एजेंसी की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया। स्वेच्छा, ओएसएम केरल, विकी लव्स और बंगाली विकीसोर्स के प्रदर्शनों ने दिखाया कि कैसे खुला, सहयोगात्मक बुनियादी ढाँचा पहुँच को लोकतांत्रिक बना सकता है और भाषाई ज्ञान को संरक्षित कर सकता है। इसके बाद एक कार्यशाला आयोजित की गई जिसमें अनुवाद मूल्यांकन पद्धतियों की आलोचनात्मक समीक्षा की गई और मानवीय तथा स्वचालित प्रणालियों की तुलना की गई। अंतिम मुख्य भाषण में, डॉ. रुक्मिणी बनर्जी ने विश्वास, सरलता और गैर-रैखिकता पर आधारित जन-केंद्रित शिक्षा का एक प्रेरक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। बहुभाषा 2025 भारत की विविध आवाज़ों को संरक्षित और पुनर्जीवित करने के लिए एक सामूहिक आह्वान है। इसने इस बात की पुष्टि की कि भाषाई विविधता का भविष्य केवल तकनीक द्वारा ही नहीं, बल्कि उन लोगों और समुदायों द्वारा निर्धारित होगा जो अपनी भाषाओं में जीते, रचना करते और स्वप्न देखते रहते हैं।
आईआईआईटी-एच के प्रो. दीप्ति मिश्रा, अराफात अहसन और टीम नें भारतीय भाषाओं के लिए एनएलपी और मशीन अनुवाद उपकरणों का परिचय दिया गया एवं एक परीक्षण सत्र भी हुआ। स्थानीयकरण और डिजिटल समावेशन पर प्रकाशक और अनुवादक की पूर्णिमा तम्मिरेड्डी, अंगिका के कुंदन अमिताभ, सिंधी वेलफेयर सोसायटी के जयेश शर्मा, ईएफएलयू के डॉ. उमा भृगुबंद, भाषाविद् हेमंत राजोपाध्याय, भारतीय विज्ञान संस्थान डॉ. बितास्ता दास नें अपने विचार रखे।
विज्ञान और कला के संगम पर अनुवाद प्रयोग विषय पर संवाद या मध्यस्थ प्रक्रिया के दौरान हुई खोजें या अंतर्दृष्टियाँ जो ऐसे अनुवाद प्रयास जो विज्ञान और कला दोनों की सीमाओं को जोड़ते या पार करते हैं। इस विषय पर प्रकाश डालने के लिए विज्ञान गैलरी, बेंगलुरु के बिंदु बी.एस., विश्वास सोलागी और शेल्विन जेम्स नें परिचर्चा की। समुदाय, सांस्कृतिक पहचान और नवाचार का संगम पर पैनल चर्चा हुई जिसमें संसाधन-विहीन और कम दृश्य भाषाई संदर्भों के लिए संसाधन तैयार करने के लिए पारी की स्मिता खटोर, कथा की साक्षी जैन, सेंट एंथोनी कॉलेज शिलांग की डॉ. मेदारी थाम, कैशुर प्रा के तौकीर अशरफ, आदिवासी जनजागृति के नितेश भारद्वाज, एकलव्य की बंसी शर्मा नें चर्चा किया।
मुक्त ज्ञान मंचों की सक्रिय भूमिका विषय पर चर्चा करते हुए ओकेआई, आईआईआईटी-एच के नितेश गिल, विकी लव्स के कृष्णा चैतन्य वेलागा, बंगाली विकिस्रोत के बोधिसत्व मंडल, ओएसएम केरल के जिनॉय टॉम जैकब और swecha के साई फणीन्द्र नें अपने विचार रखे। मूल्यांकन करने वालों का मूल्यांकन, अनुवाद मूल्यांकन का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन विषय पर एलटीआरसी, आईआईआईटी-एच के अराफात अहसन और टीम नें परीक्षण प्रदर्शन प्रस्‍तुत किया।
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